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Wednesday, October 31, 2018

तेजी से घट रहा है वजन, तो इन बीमारियाें काे हाे सकते हैं संकेत


तेजी से घट रहा है वजन, तो इन बीमारियाें काे हाे सकते हैं संकेत


तेजी से घट रहा है वजन, तो इन बीमारियाें काे हाे सकते हैं संकेत


स्वस्थ इंसान के वजन का निर्धारण उसके भोजन, उम्र, लंबाई आदि के आधार पर किया जाता है। अक्सर कई वजहों से वजन घटता-बढ़ता रहता है। लेकिन अगर ठीक खान-पान के बावजूद और बिना कोई कोशिश किए तेजी से वजन कम हो रहा है तो मामला गंभीर हो सकता है। खासतौर पर अगर छह महीने में पांच फीसदी से ज्यादा या फिर पांच किलो तक वजन कम हो गया हो तो फिर ये किसी गंभीर बीमारी का लक्षण हो सकता है।
डायबिटीज की आशंका
अगर आपको बार-बार प्यास और भूख लगती है, शरीर भी थका-थका रहता है। पेशाब के लिए बार-बार जाना पड़ता है। तेजी से वजन भी घट रहा है तो आप डायबिटीज की समस्या से पीडि़त हो सकते हैं। इस बीमारी में ब्लड शुगर को शरीर ग्रहण नहीं कर पाता और यह शुगर पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकल आता है। इस क्रिया में काफी ऊर्जा खर्च होती है। जिससे वजन गिरने लग जाता है।
हाइपोथाइरॉयड के संकेत
कई बार हाइपोथाइरॉयड के मरीजों का वजन भी तेजी से गिरता है। थकान, सिरदर्द, बार-बार भूख लगना, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसे लक्षणों के साथ अगर तेजी से वजन भी गिर रहा हो तो ये हाइपोथाइरॉयड का लक्षण हो सकता है। हालांकि हाइपोथाइरॉयड के मरीजों में कई बार उल्टा भी होता है। यानी उनका वजन तेजी से बढ़ता है।
तनाव होना
कई बार तनाव की दशा में इंसान को भूख कम लगती है। कम खाने की वजह से शरीर को जरूरी ईंधन नहीं मिल पाता। ऐसे में शरीर में जमा फैट टूटकर ग्लूकोज में बदलता है और शरीर इसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल करता है। इस वजह से भी वजन कम होने लग जाता है।
कैंसर होना
कैंसर के एक तिहाई मामलों में खासकर ज्यादा उम्र वालों में वजन तेजी से घटता है। इसकी वजह है कि कैंसर कोशिकाएं तेजी से बढ़ती है और इसके लिए उन्हें भारी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होती है।
मानसिक रूप से अस्वस्थ
तेजी से वजन कम होने की वजहों में मानसिक रूप से कमजोर होना भी है। यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान है या फिर उसका इलाज चल रहा हो तो भी ऐसे व्यक्ति का वजन तेजी से बढऩे लगता है या फिर गिरने लगता है।
किसी काम का दबाव होना
कई मामलों में दबाव या प्रेशर भी वजन गिरने का कारण बनते हैं। बुरे हालात या मुश्किलों में भी इंसान कम वजन की चपेट में आ जाता है। जब हम कम खाना खाते हैं तो शरीर को संपूर्ण कैलारी व ऊर्जा नहीं मिल पाती, ऐसे में पोषक तत्वों के अभाव से हमारी प्रतिरोधात्मक क्षमता कम हो जाती है। इसके अलावा लिवर या दिल की समस्याओं के कारण भी वजन कम हो सकता है। इसलिए जब भी वजन कम हो तो इसे नजरअंदाज मत कीजिए।
आंतों की बीमारी
कई बार पेट और आंत संबंधी बीमारियों में शरीर भोजन को पूरी तरह से ग्रहण नहीं कर पाता और जो भोजन शरीर में जाता भी है उसका प्रयोग जरूरत के मुताबिक नहीं हो पाता इसलिए तेजी से वजन घटता है।

Monday, October 29, 2018

घुटने के जोड़ों की उम्र बढ़ाती है गुणकारी हल्दी , लम्बे समय तक दर्द में रहता है अाराम


घुटने के जोड़ों की उम्र बढ़ाती है गुणकारी हल्दी , लम्बे समय तक दर्द में रहता है अाराम

कम्युनिटी ओरिएन्टेड प्रोग्राम फॉर कंट्रोल ऑफ रियुमेटिक डिजीज द्वारा जोड़ों के दर्द और बीमारियों के सम्बंध में एशिया-पैसेफिक रीजन में किए एक शोध के मुताबिक जोड़ों में होने वाले दर्द में घुटनों के दर्द का प्रतिशत सर्वाधिक 13.2 है। इस अध्ययन ने एक और भ्रांति दूर की है कि यह समस्या सिर्फ वृद्धों में ही पाई जाती है, अध्ययन के दौरान पाया गया कि 18.2 प्रतिशत युवा भी जोड़ के रोगों से प्रभावित हो रहे हैं।
घुटने में दर्द की कई वजहें होती है। लिगामेंट्स का क्षतिग्रस्त हो जाना भी घुटने में दर्द पैदा होने की एक बड़ी वजह है। इनमें से कुछ प्रमुख हैं-आर्थराइटिस, रीयूमेटाइड, आस्टियोआर्थराइटिस और गाउट जैसी तकलीफों से दर्द होता है।टेन्टीनाइटिस में घुटने में सामने की ओर दर्द होता है। यह दर्द सीढिय़ों अथवा चढ़ाव पर चढ़ते और उतरते समय बढ़ जाता है। यह धावकों और साइकिल चलाने वालों को ज्यादा होता है।घिसा हुआ कार्टिलेज या उपास्थि भी घुटने में दर्द की वजह होती है। इसे मेनिस्कस टियर भी कहा जाता है। इस समस्या के दौरान घुटने के जोड़ के अंदर की ओर या बाहर की ओर दर्द पैदा हो सकता है।चोट लगना और फ्रेक्चर होने जैसी समस्याएं भी घुटने की हालत खराब कर सकते हैं। इन सबके अलावा नीकैप के खिसकने, जोड़ में संक्रमण जैसी समस्याओं से भी घुटने में स्थाई दर्द हो सकता है।
ऐसे करें नी केयर
- कैल्शियम को अपने भोजन का हिस्सा बनाइए।
- सेंट जॉन मेडिकल कॉलेज, बैंगलोर में हुए शोध में सामने आया कि हल्दी के नियमित इस्तेमाल से जोड़ो के दर्द में राहत मिलती है और जोड़ लंबे समय तक स्वस्थ रहते हैं। 
- घुटने से जुड़े व्यायाम को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाइए। धीरे-धीरे साइकिल चलाना एक अच्छा विकल्प है लेकिन यह घुटने की तकलीफ होने से पहले का परामर्श है। दर्द का सामना कर रहे लोगों को इससे बचना चाहिए। 
- अपनी क्षमता से ज्यादा वजन उठाने से बचें। ऐसा करके आप अपने पूरे शारीरिक ढांचे को खतरे में डाल रहे हैं। अगर आपका वजन ज्यादा है तो ये खतरे की घंटी है।

Friday, October 26, 2018

गर्भवती और ये मरीज डॉक्टरी सलाह बिना न करें करवाचौथ व्रत


गर्भवती और ये मरीज डॉक्टरी सलाह बिना न करें करवाचौथ व्रत

गर्भवती और ये मरीज डॉक्टरी सलाह बिना न करें करवाचौथ व्रत


करवाचौथ का व्रत महिलाएं पति की लम्बी उम्र और युवतियां अच्छा पति पाने के लिए करती हैं। बहुत सी महिलाएं निर्जला व्रत करती हैं, जिससे शरीर में पानी व जरूरी पोषक तत्त्वों की कमी भी हो सकती है। ऐसे में व्रत से पहले और व्रत के बाद खाने-पीने की आदतें सेहत को नुकसान पहुंचाती हैं। इस कारण कई महिलाओं को शाम होने तक चक्कर आते हैं। जानते हैं, करवाचौथ पर कैसे अपनी सेहत का ख्याल रखें। 

व्रत से पहले न खाएं मीठी चीजें

महिलाएं अक्सर व्रत से एक दिन पहले हैवी डिनर करती हैं। बदहजमी की दिक्कत हो सकती है। व्रत से पहले सुबह मीठा व ऐसा कुछ न खाएं जिससे प्यास ज्यादा लगे। मीठा खाने से प्यास ज्यादा लगती है। 

व्रत के बाद न पीएं चाय-कॉफी

व्रत खोलने के बाद हैवी खाना तला-भुना फ़ास्ट-फ़ूड न लें। यदि लेते हैं तो गैस, एसिडिटी और पेट संबंधी समस्या हे सकती है। सबसे पहले आधा गिलास पानी पीएं। इसके बाद सूप या कम फैट का दूध ले सकती हैं। फिर फल, सूखे मेवे और संतुलित व सुपाच्य खाएं। सेहत के लिए फायदेमंद रहेगा। व्रत रखने के बाद कमजोरी लगने पर प्रोटीन से भरपूर आहार लें। इससे शरीर को एनर्जी मिलेगी। इसके अलावा नींबू पानी, लस्सी, नारियल पानी और मौसमी का जूस और दही के साथ फलों का इस्तेमाल कर सकते हैं। व्रत के तुरंत बाद चाय और कॉफ़ी न पीएं, इससे एसिडिटी हो सकती है। 
लो बीपी के मरीज तो रखें विशेष ध्यान
लो बीपी की समस्या में ज्यादा देर तक भूखा रहने से बीपी कम हो सकता है। इससे बेहोशी, हाथ-पांव ठंडे होकर जकडऩ जैसी समस्या हो सकती है। थोड़े समय के अंतराल पर फलाहार जरूर लें। इससे शरीर में ऊर्जा बनी रहेगी। गैस की दिक्कतमें व्रत शुरू करने से पहले तली चीजें खाने से सिरदर्द, एसिडिटी बढ़ सकती है। मधुमेह, दवा लेने वाले और गर्भवती, स्तनपान कराने वाली महिलाएं डॉक्टर की सलाह के बिना व्रत न करें। 
गर्भवती महिलाओं की दिनचर्या 
गर्भवती डॉक्टर की सलाह से व्रत करें तो खानपान का ख़ास ख्याल रखें। निर्जल व्रत न रखें, हर दो घंटे के बाद फलाहार और पौष्टिक आहार का इस्तेमाल करना चाहिए। पानी ना पीने से डिहाइड्रेशन होने का खतरा रहता है। दिनभर भूखे-प्यासे रहने से गर्भवती के शरीर में हाइपोग्लाइसिमिक शुगर का लेवल गिर सकता है। गर्भावस्था के आखिरी तीन महीने में व्रत न रखें। व्रत के दौरान बेहोशी, चक्कर और उल्टी के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें। जूस, मिल्क शेक्स, फ्रूट्स, रायता, मीठी लस्सी और खाने में साबूदाने खिचड़ी या टिकिया इस्तेमाल कर सकते हैं। शुरुआत के तीन महीनों में जिन महिलाओं को जी मिचलाना, उल्टी जैसी समस्या होने पर व्रत रखने की सलाह नहीं दी जाती है। गर्भावस्था के आखिरी तीन महीनों में व्रत में भूखे-प्यासे रहने से गर्भ में भ्रूण की हलचल धीमी हो जाती है। कुछ महिलाओं में पानी की कमी पायी जाती है, उन्हें व्रत नहीं करना चाहिए, बच्चे की ह्रदय गति अनियंत्रित हो सकती है। 
सरगी में सुबह ड्राई फ्रूट्स लें 
करवाचौथ के व्रत में सुबह सरगी खाई जाती है, जिसके बाद महिलाएं दिनभर भूखे रहकर व्रत करती हैं। सरगी में सुबह ड्राई फ्रूट्स लें, जिससे दिनभर भूख नहीं लगेगी और ऊर्जावान रहेंगें। गुनगुना दूध ले सकते हैं।

Systemic Examination

Systemic Examination 

Systemic Examination

Systemic examination reviews the major systems of the body like the Central nervous system, Respiratory system, Cardiovascular system and Gastrointestinal system.
Generally, there are 4 parts of physical examination:
     Inspection: Looking for signs
     Palpation: Feeling for signs
     Percussion: Tapping for signs, used when doing a lung, heart or gut examination.
     Auscultation: Listening for sounds within the body using a stethoscope, or in olden times, purely listening with direct ear.
The module is designed in such a way that the user can do the systemic examination of these systems of the virtual patient using the above mentioned 4 main techniques.
Systemic examination is currently divided into 4 sub-modules/segments:
     Central Nervous System
     Respiratory System
     Cardiovascular System
     Abdomen Examination
Each of these modules is further classified into various examinations/techniques/activities which are explained in detail below. The doctor needs to do only those activities relevant for the given virtual case to diagnose correctly.

Wednesday, October 24, 2018

प्रसव के बाद मसल्स कमजोर होने से रहती है कब्ज


प्रसव के बाद मसल्स कमजोर होने से रहती है कब्ज

प्रसव के बाद मसल्स कमजोर होने से रहती है कब्ज


कब्ज का एक प्रकार है ओडीएस यानी ऑब्स्ट्रक्टिव डिफिकेट्री सिंड्रोम। इसमें व्यक्ति को मोशन करने की इच्छा तो होती है लेकिन वह कर नहीं पाता। क्षमता से ज्यादा जोर लगाने के बावजूद स्टूल पास नहीं कर पाता। महिलाओं में ऐसा ज्यादा होता है। कारण प्रसव के बाद कूल्हे व आसपास की नसों का कमजोर होना अहम है। अक्सर व्यक्ति समस्या को साक्षा करने में हिचकिचाता है। 
बे समय से कब्ज की समस्या और गुदा मार्ग की मांसपेशियों के कमजोर होने से अक्सर व्यक्ति को ओडीएस के शिकायत रहती है। तकलीफ के गंभीर रूप लेने का एक कारण समस्या को छिपाना भी है। ज्यादातर मरीज तकलीफ के बढऩे पर जब विशेषज्ञ के पास जाते हैं तो बार-बार पूछने पर हिचकिचाते हुए बताते हैं कि उन्हें कई बार अंगुली के सहारे स्टूल निकालना पड़ता है। ओडीएस की दिक्कत होने पर मोशन करने की सोच से व्यक्ति बार-बार शौचालय जाता है लेकिन पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो पाता। भोजन में फाइबर व प्रोटीन युक्त चीजें लें। जैसे मौसमी, हरी सब्जियां, सोयाबीन, दालें, दानामेथी, अलसी के बीज आदि। मार्केट की चीजों से जितना हो सके परहेज करें। शाकाहारी भोजन लें।
इन लक्षणों से होती पहचान 
मरीज को गुदा व इसके आसपास हल्का दर्द महसूस होता है। साथ ही प्रभावित भाग पर व चारों तरफ घाव या कई बार खून आने की शिकायत। कई बार इस समस्या की पहचान पाइल्स के रूप में उभरकर आती है। इंफेक्शन भी एक लक्षण है। 
परेशानी को नजरअंदाज न करें 
अक्सर बुजुर्गों में देखा गया है कि वे पेट या मोशन संबंधी किसी भी परेशानी के लिए चूर्ण या आयुर्वेदिक उपचार अपनाते लेते हैं। हालांकि इनसे फर्क भी पड़ता है। लेकिन बिना आयुर्वेदाचार्य के निर्देश से लिया गया चूर्ण भी स्थिति को धीरे-धीरे गंभीर कर देता है। परेशानी को नजरअंदाज करने से महिलाओं में भविष्य में यूरिनरी इन्कॉन्टिनेंस और मोशन संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं।
पहचान के लिए ये जांचें कराते 
प्रॉक्टोस्कोपी, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई आदि के माध्यम से रोग की स्थिति पता करते हैं। मुख्य रूप से एमआरडी (मैग्नेटिक रिसोनेंस डिटेक्टर) को अपनाते हैं। इसमें परेशानी वाले हिस्से की वीडियो बनाते हैं व स्टडी कर इलाज तय करते हैं। 
दिनचर्या व खानपान में बदलाव
रोग की गंभीरता और स्थिति के आधार पर दवाएं देते हैं और दिनचर्या व खानपान में बदलाव किया जाता है। एडवांस्ड स्टेज में स्ट्रक्चरल डिफैक्ट्स को देखकर सर्जरी करते हैं। प्रमुख रूप से स्टेपल्ड ट्रांसेनल रेक्टल रिसेक्शन (स्टार) करते हैं। दिनचर्या में योग और एक्सरसाइज को कम से कम 20 मिनट जरूर करें। वहीं महिलाओं को पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज करनी चाहिए।

Tuesday, October 23, 2018

खाने के तुरंत बाद भूलकर भी न करें ये काम, होगा सेहत को नुकसान


खाने के तुरंत बाद भूलकर भी न करें ये काम, होगा सेहत को नुकसान

खाने के तुरंत बाद भूलकर भी न करें ये काम, होगा सेहत को नुकसान

कुल काम एेसे होते हैं जो खाना खाने के तुरंत बाद नहीं करने चाहिए। आइये जानते हैं कुछ एेसी बातों के बारे में जो खाने के तुरंत बाद करने से सेहत को नुकसान होता है।
धूम्रपान करना -
हमेशा याद रखें खाना खाने के तुंरत बाद सिगरेट न पीएं। स्मोकिंग करने वाले लोग अक्सर खाना खाने के बाद सिगरेट की तलब को पूरा करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खाना खाने के तुरंत बाद धूम्रपान करना आमतौर पर धूम्रपान करने से 10 गुना ज्यादा घातक होता है।
फल खाना-
खाना खाने के साथ या खाने के बाद सेब, केला, अंगूर या कोई अन्य फल का सेवन नहीं करना चाहिए। खाने के बाद फल खाने से पेट में गैस बन सकती हैै।
नहाना-
कुछ लोगों की आदत होती है कि वे खाने के बाद ही तुरंत नाहने लगते हैं। खाने के बाद नाहने से हाथ-पैर और अन्य हिस्सों में खून का प्रवाह बढ़ जाता है और पेट के पास यह कम हो जाता है। इससे पाचन तंत्र कमजोर होता है। इस लिए हमेशा याद रखें कि जब खाना खाएं उसके तुरंत बाद स्नान न करें।
चाय पीना-
चाय में अम्ल तत्व होते हैं, अम्ल भोजन के प्रोटीन कंटेंट को कठोर कर देता है। इससे भोजन को पचने में परेशानी होती है। इस लिए खाने के तुरंत बाद चाय नहीं पीनी चाहिए।
सोना -
देर रात भोजन के बाद टीवी देखते-देखते सोने से पाचन तंत्र, हार्ट बर्न, गले में जलन और आंतों में इंफेक्शन हो सकता है।

जानें क्या है मिट्टी और धूप से बच्चों के बीमार होने की वजह



जानें क्या है मिट्टी और धूप से बच्चों के बीमार होने की वजह

जानें क्या है मिट्टी और धूप से बच्चों के बीमार होने की वजह


मौसम बदलते ही सबसे पहले बच्चे बीमार क्यों पड़ते हैं, इस बारे में क्या आपने कभी सोचा है। इसका आम जवाब होगा कि बच्चों में बीमारियों से लड़ने की इम्युनिटी कम होने के कारण ऐसा होता है लेकिन डॉक्टर इसकी एक बड़ी वजह हाइजीन हाइपोथीसिज्म को मानते हैं। इसका मतलब हमारी उस आदत से है जिसमें हम आजकल बच्चों को बहुत ज्यादा साफ-सफाई से रहने पर जोर देते हैं या फिर वे घरों में एसी में रहते हैं, बाहर मैदान-मिट्टी में खेलने नहीं जाते हैं जिससे उनका बाहरी चीजों से सीधा सम्पर्क नहीं हो पाता है। जब बच्चे बाहरी वातावरण के ज्यादा सम्पर्क में नहीं आएंगे तो उनका शरीर किसी दूसरे माहौल को तुरंत स्वीकार करने का आदी नहीं होगा और जैसे ही वे दूषित तत्वों या किटाणुओं के सम्पर्क में आएंगे तुरंत बीमार पड़ जाएंगे।
पल्मोनरी विशेषज्ञ (श्वसम तंत्र ) इसकी एक वजह एलर्जी की समस्या होना भी हो सकती है। किसी भी चीज से शरीर की अतिसंवेदनशीलता ही एलर्जी है यानी शरीर इस चीज को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। इसके मरीजों में इलाज से पहले एलर्जी किस चीज से हो रही है, इसकी पहचान करना जरूरी है। हर मरीज में एलर्जी की वजह अलग-अलग होती है जैसे किसी को मौसम में बदलाव सूट नहीं करता, किसी को ठंडी हवा, धुआं, सिगरेट, कोई खास गंध, खानपान की चीजें, प्रदूषण से जुड़े कारण आदि। जब व्यक्ति इनके संपर्क में आता है तो उसकी नाक या गले में सबसे पहले इसके असर से सूजन या संक्रमण की शिकायत होती है। फिर ये संक्रमण फेफड़ों तक पहुंचकर खांसी या कफ की दिक्कत करता है। एलर्जी की समस्या आनुवांशिकीय होती है जो परिवार में चलती है यानी दादा-दादी से माता-पिता या भाई-बहिन में से किसी न किसी को कभी होने की हिस्ट्री रही होगी।

Sunday, October 21, 2018

डॉक्टर की परामर्श बिना दवाएं लेना हो सकता है सेहत के लिए घातक


डॉक्टर की परामर्श बिना दवाएं लेना हो सकता है सेहत के लिए घातक


कहीं आप खुद ही अपने डॉक्टर तो नहीं बन रहे हैं? कभी सिर दर्द हुआ, पेट दर्द हुआ और खुद से ही कोई गोली या दवा ले ली। यदि ऐसा लंबे समय से कर रहे हैं तो समझिए कि आपको गोलियोंं की आदत पड़ गई है यानी आप पिल्स एडिक्ट हो गए हैं। यह आपके स्वास्थ्य के लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा करके आप अपने जीवन से ही खिलवाड़ करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार बिना परामर्श ली गई दवा कई साइड इफेक्ट दे सकती हैं। इससे मेडिकेशन एसिड रिएक्शन या हार्टबर्न हो सकता है। यही नहीं पेट के अल्सर, किडनी और लिवर डैमेज व हार्ट अटैक भी हो सकता है। कुछ लोग सभी तरह की गोली जैसे पेन किलर्स, एंटिडिप्रेशंट और यहां तक कि कफ सिरप के भी एडिक्ट हो सकते हैं। ज्यादातर मामलों में यह एडिक्शन तब शुरू होता है, जब वे खुद ही अपना ट्रीटमेंट करना शुरू कर देते हैं। जब आप नींद की गोलियां और एंटिबॉयटिक अपनी मर्जी से लेते हैं, तो ये आपके लिए बेहद नुकसानदेह हो सकती हैं। खासतौर पर जब आपको नहीं पता कि आप इसके जरिए कौन से स्पेसिफिक कंपाउंड ले रहे हैं? आपको इसकी कितनी डोज की जरूरत है और आपको यह दवाई कितने समय तक लेनी है? इस कन्फ्यूजन में आप और ज्यादा बीमार हो जाते हैं।
दर्द निवारक दवाओं से नुकसान-
इस मामले में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा लापरवाह होती हैं। थोड़ा सा दर्द हुआ नहीं कि बिना किसी परामर्श के दवा खा लेती हैं। अपनी मर्जी से दर्द निवारक लेने की वजह से पेट संबंधी बीमारी, कानों में सीटियां बजना, चमड़ी पर निशान और रेशेज उभरना, रक्त संबधी, मूत्र संबंधी, कब्ज, बालों का गिरना, नींद न आना जैसी बीमारियां घेर लेती हैं।
कहीं आपको दवाओं की लत तो नहीं?
आप बात-बात पर गोली लेेते हैं। कई बार गोली लेना आपकी मजबूरी बन जाती है। आप जरूरत से ज्यादा डोज का इस्तेमाल करने लगें, तो समझिए कि आपको पिल्स एडिक्शन हो गया है। इसमें आप लगातार गोली लेते हैं, फिर चाहे वह आपकी जॉब परफॉर्मेंस, रिलेशनशिप या जिंदगी का कोई भी खराब पहलू हो, आपको गोली लेना ही सबसे ठीक समाधान लगता हो।
समाधान भी हैं-
छोटी-छोटी बीमारी पर दवा लेने से बचाव का सबसे सही तरीका है खुद का डॉक्टर न बनना। किसी भी तरह के विकार होने पर किसी विशेषज्ञ की मदद लें। लाइफस्टाइल में थोड़ा बदलाव लाएं। कम से कम अकेले रहें। हैल्दी डाइट लें, नियमित रूप से व्यायाम करते रहें। मेडिटेशन, योगा और वॉकिंग करना अच्छा होगा। छोटी-मोटी बीमारी के लिए आयुर्वेदिक नुस्खों और परंपरागत पद्धतियों का सहारा लें। इसके अलावा गु्रप थैरेपी भी एक ऑप्शन हो सकता है। जो लोग इस लत के शिकार हैं उनसे बात करें, चर्चा करें और खुद को इस लत से बाहर आने के लिए प्रेरित करें।

Saturday, October 20, 2018

जानें आर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोसिस में अंतर

जानें आर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोसिस में अंतर

जानें आर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोसिस में अंतर


हड्डियों का कमजोर होना उम्र से जुड़ी एक प्रक्रिया है, आमतौर पर 50 से 60 की उम्र के बाद हड्डियां कमजोर होने लगती हैं, ज्यादातर लोगों को इसके कारण जोड़ों के दर्द, ऑर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हड्डियों के कमजोर होने के कारण हड्डियों की बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी कई बीमारियां हैं, जिनका असर हमारी हड्डियों पर पड़ता है लेकिन अक्सर लोग इनके बीच का अंतर नहीं समझ पाते। इस लिए world osteoporosis day के मौके पर हम आपको ऑर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोस जैसी हड्डी की बीमारियों के बीच अंतर बता रहे हैं।
ऑर्थराइटिस में तकरीबन 100 तरह की हड्डियों की बीमारियां शामिल हैं। ऑर्थराइटिस के कारण होने वाला दर्द हल्का या बहुत तेज हो सकता है। इसका लक्षण है जोड़ों में अकड़न, सूजन और चलने-फिरने में परेशानी। वहीं ऑस्टियोपोरोसिस में समय के साथ हड्डियों की डेनसिटी (घनत्व) कम हो जाता है। हड्डियों के ट्श्यिूज नियमित रूप से नवीनीकृत होते रहते हैं। हालांकि जब यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है, तो हड्डियां कमजोर हो जाती है और इनमें फ्रैक्चर की संभावना बढ़ जाती है।
ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षण बहुत हल्के या बहुत गंभीर हो सकते हैं। इसके कारण कभी-कभी व्यक्ति की ऊंचाई भी कम हो जाती है। गर्दन या पीठ के नीचले हिस्से में दर्द होना इसका आम लक्षण है।
50-55 साल की उम्र तक पुरुषों में ऑस्टियोपोरोसिस संभावना अधिक होती है। लेकिन मेनोपॉज के बाद महिलाओं में इन बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है। महिलाओं का हॉर्मोन एस्ट्रोजन हड्डियों के कार्टिलेज को सुरक्षित रखता है और हड्डियों में होने वाली टूट फूट की मरम्मत करता रहता है। लेकिन मेनोपॉज के बाद महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे ऑर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोसिस की संभावना बढ़ जाती है।
हाल ही में पाया गया है कि प्रदूषण के कारण हड्डियों के कमजोर होने की संभावना बढ़ जाती है। बुजुर्ग जो वाहनों एवं उद्योगों के कारण होने वाले वायु प्रदूषण के संपर्क में रहते हैं, उनमें हड्डियों की बीमारियां और फै्रक्चर की संभावना अधिक होती है। इसलिए अपने आप को वायु प्रदूषण से सुरक्षित रखें।
हड्डियों की बीमारियों से बचने के लिए पोषण और संतुलित आहार से बेहतर कुछ नहीं है। अपने आहार में कैल्शियम से युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करें। डेेयरी उत्पादों जैसे दूध, दही, योगर्ट, चीज तथा हरी सब्जियों जैसे पालक, ब्रॉकली आदि में कैल्शियन भरपूर मात्रा में पाया जाता है। विटामिन डी कैल्शियम को अवशोषित करने के लिए बहुत जरूरी है। अगर आपके शरीर में विटामिन डी की कमी है तो कैल्शियम युक्त आहार लेने का भी कोई फायदा नहीं, क्योंकि विटामिन डी न होने के कारण शरीर कैल्शियम को अवशोषित नहीं कर पाएगा।
धूम्रपान और ज्यादा शराब का सेवन न करें, क्योंकि इनका बुरा असर हड्डियों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। गतिहीन जीवनशैली से बचें। व्यायाम नहीं करने का बुरा असर हड्डियों पर पड़ता है। नियमित व्यायाम जैसे सैर करना, जॉगिंग करना, नाचना, एरोबिक्स, खेल आदि आपकी हड्डियों को मजबूत बनाए रखते हैं।

Friday, October 19, 2018

Homeopathic Treatment Of Sciatica In Hindi [ Sciatica का होम्योपैथिक इलाज ]

Homeopathic Treatment Of Sciatica In Hindi [ Sciatica का होम्योपैथिक इलाज ]


Sciatica pain


इस पोस्ट में हम sciatica और उसकी होम्योपैथिक दवा के बारे में जानेंगे।
Sciatica एक तरह का neuralgia है। Neuralgia में नसों में सूजन आ जाती है, ऐसे दर्द होता है, जैसा करंट मारने में होता है। Sciatic Nerve के दबने के कारण उसमे neuralgia होने लगता है और जहाँ तक Sciatic Nerve जाती है वहां तक करंट मारने जैसा दर्द महसूस होता है। Sciatic Nerve कमर से लेकर पैर तक जाती है। अगर आपको Sciatica है तो दर्द आपके कमर के नीचे वाले भाग से शुरू होकर पैर तक जायेगा। Sciatica ज्यादातर बाईं तरह होता है। दाईं तरह होने की सम्भावना कम होती है। इसमें दर्द एक ही तरफ ज्यादा महसूस होता है। किसी-किसी केस में दर्द दोनों तरफ महसूस होता है। इसमें शुरुआत में दर्द कम होता है परन्तु बाद में करंट जैसा दर्द इतना बढ़ जाता है कि उठना-बैठना मुश्किल हो जाता है।
जिन लोगों का वजन ज्यादा है और उनका बैठने का काम है तो उनको Sciatica होने की सम्भावना ज्यादा होती है। ये कमर दर्द से शुरू होता है और बाद में जाकर Sciatica का रूप ले लेता है। अगर आपका जॉब बैठने का है और हर 15 से 20 मिनट में उठ कर थोड़ा टहल लें और कमर को पीछे की तरह मोड़ कर थोड़ा कमर का व्यायाम जरूर कर लें। इससे आपको Sciatica होने की सम्भावना कम हो जाएगी।

Sciatica की होम्योपैथिक दवा

Colocynthis200 – ये दवा Sciatica के लिए बहुत असरकारक है। Sciatica में pain killer के रूप में इसका इस्तेमाल होता है और Sciatic Nerve को खोलने में, उसके compression को कम करने में ये बहुत ज्यादा मददगार है। इस दवा की 2 बून्द को   दिन में 3 बार लें।
Arnica Montana 200 – इसकी दो बून्द दिन में तीन बार सीधा जीभ पे ले लेना है। ये Blood supply और nerve supply को बढाती है जिससे झुनझुनाहट जैसा जो महसूस होता है, दर्द करता है उसमे आराम मिलता है। इससे आपको बहुत अच्छे रिजल्ट मिलेंगे।
Viscum album 30 – इसे भी दिन में तीन बाद दो बून्द सीधा tongue पे लें। ये Sciatica nerve में बहुत अच्छा काम करती है उसे शक्ति प्रदान करती है।
Dr Reckeweg R71 – R71 Sciatica Drops के नाम से भी जानी जाती है। Sciatica के लिए ये बहुत ही अच्छी मेडिसिन है। इसकी 10-20 बून्द को आधे कप पानी में दिन में 3 बार लें। इससे नसों में सूजन, दर्द, कमर दर्द सब में आराम आएगा और नसों में ताकत आएगी। 

Thursday, October 18, 2018

त्‍योहार के सीजन में नए कपड़े लेने के बाद जरुर धोएं, वरना हो सकती है ये प्रॉब्‍लम

त्‍योहार के सीजन में नए कपड़े लेने के बाद जरुर धोएं, वरना हो सकती है ये प्रॉब्‍लम


फेस्टिव सीजन शुरु हो चुका है, लोगों ने तो त्‍योहार में नया कपड़े पहनने के ल‍िए अभी से ही शॉपिंग शुरु कर दी है। कई लोग तो अभी से नए कपड़े खरीदकर ले भी आएं होंगे। लेकिन नए कपड़ों की शॉपिंग करने के बाद क्‍या खरीदने आपने इन्‍हें धोया? जी हां आपने सही सुना, अब आप सोच रही होंगे कि नए कपड़ों को खरीदने के बाद इन्‍हें धोने की क्‍या जरुरत है? हम आपको बता रहें कि अगर आप भी नए कपड़ों को बिना धोए पहन लेते हैं, तो ऐसा करने से आपकी स्किन इफेक्‍ट हो सकती है।

दरअसल, नए कपड़ों को हमसे पहले भी कई लोग पहन कर ट्राई करते हैं। यदि किसी व्यक्ति को स्किन से संबंधित कोई समस्या होगी, तो उसका इंफेक्शन आपको भी हो सकता है। कई बार कपड़ों में इस्तेमाल होने वाले केमिकल के अंश भी कपड़ों में रह जाते हैं। ऐसे में जब आप बिना धोए कपड़ों को पहनते हैं, तो इन केमिकल्स के कुछ अंश त्वचा से रिएक्शन करते हैं। इससे एलर्जी होने का खतरा बढ़ जाता है।

कैसे कपड़ों से पहुंचता है इंफेक्‍शन अक्‍सर आपने देखा ही होगा कि शॉपिंग मॉल में आप से पहले नए कपड़ों को बहुत लोग ट्रायल रुम में पहनकर देखते हैं। जिस मॉल या शॉप से आप कपड़े खरीदते हैं, वहां भी वे कपड़े पहुंचने से पहले कई स्थानों से होकर गुजरते हैं। क्या आप जानते हैं कि कपड़ों को केमिकल से कलर करने के बाद उन्हें धोया या साफ नहीं किया जाता है। ऐसे में केमिकल कलर के कुछ अंश कपड़ों में रह जाते हैं। जो आपके शरीर के सम्‍पर्क में आने से आपको संक्रमित कर सकता है।


कैसे कपड़ों से पहुंचता है इंफेक्‍शन

अक्‍सर आपने देखा ही होगा कि शॉपिंग मॉल में आप से पहले नए कपड़ों को बहुत लोग ट्रायल रुम में पहनकर देखते हैं। जिस मॉल या शॉप से आप कपड़े खरीदते हैं, वहां भी वे कपड़े पहुंचने से पहले कई स्थानों से होकर गुजरते हैं। क्या आप जानते हैं कि कपड़ों को केमिकल से कलर करने के बाद उन्हें धोया या साफ नहीं किया जाता है। ऐसे में केमिकल कलर के कुछ अंश कपड़ों में रह जाते हैं। जो आपके शरीर के सम्‍पर्क में आने से आपको संक्रमित कर सकता है।

क्या हो सकते है नुकसान?

रह जाते है बैक्‍टीरिया

स्किन इंफेक्‍शन

आपको नहीं मालूम होता है कि आपसे पहले किस ने मॉल में या ट्रायल रुम में कपड़ों को ट्राय किया है। हो सकता हो कि आप जिस कपड़ें को ट्राय कर रहें हो, आपसे पहले जिसने उसे ट्राय किया हो उसे कोई स्किन डिजीज हो। जब आप उन्हीं कपड़ों को ट्राई करते हैं, तो उसके पसीने या इंफेक्‍शन के जर्म आपकी त्वचा पर आ जाते हैं। इससे आपको स्किन इंफेक्शन का शिकार होना पड़ता है।



Wednesday, October 17, 2018

Dacryocystitis

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*Dacryocystitis : 👇

is an inflammation of the lacrimal sac.

 *Etiology:👇

# In children:
Staphylococcus aureus, B-hemolytic Streptococcus and Pneumococcus and Haemophilus influenzae
# In adults: 👉Staphylococcus epidermidis, Staphylococcus aureus, Streptococcus pneumoniae and Pseudomonas aeruginosa

# Risk Factors:👇

Almost always related to nasolacrimal duct obstruction.
Nasal pathologies like nasal septum deviation, rhinitis and inferior turbinate hypertrophy on the same side.
Female is also a known risk factor for the development of this infectious condition due to narrow duct diameter.
The presence of dacryoliths at various levels of the lacrimal drainage system.
The occurrence of acute dacryocystitis being more prevalent with increasing age.

*Pathophysiology:👇

Dacryocystitis usually occurs because of obstruction of the nasolacrimal duct. The obstruction may be an idiopathic inflammatory stenosis (primary acquired nasolacrimal duct obstruction) or maybe secondary to trauma, infection, inflammation, neoplasm, or mechanical obstruction (secondary acquired lacrimal drainage obstruction). Obstruction of the nasolacrimal duct leads to stagnation of tears in a pathologically closed lacrimal drainage system which can result in dacryocystitis

*Symptoms and Signs:👇

Congenital dacryocystitis is a serious disease associated with significant morbidity and mortality. If it is not treated promptly and aggressively, newborn infants can experience orbital cellulitis (because the orbital septum is formed poorly in infants), brain abscess, meningitis, sepsis, and death.

Acquired dacryocystitis can be acute or chronic.

*Acute dacryocystitis: is heralded by the sudden onset of pain and redness in the medial canthal region.

Acute dacryocystitis
Sudden onset of pain, redness, and edema overlying the lacrimal sac area.
It is not uncommon for the sac to rupture and fistulize through the skin. This fistula commonly closes after a few days of drainage.
Conjunctival injection and preseptal cellulitis often occur in conjunction with acute dacryocystitis.
More serious sequelae of acute dacryocystitis is the extension into the orbit with formation of an abscess and development of orbital cellulitis.
*Chronic dacryocystitis:
Tearing is the most common presentation
Mattering:
This is caused by the obstruction of drainage of the mucous layer of the tear film with collection of debris and denuded epithelial cells from the surface of the eye.
Chronic low grade bacterial infection inside the lacrimal sac.
*Diagnostic procedures:👇
The diagnosis is clinical in most cases.
Blood counts may reveal leucocytosis.
Antineutrophilic cytoplasmic antibody testing may be useful to rule out granulomatosis with polyangiitis (formerly Wegener's).
Imaging is rarely needed. In most cases it may reveal enlargement of the sac or foreign bodies or masses. Post traumatic cases or cases suspected of harboring an occult malignancy, Computer Tomography (CT) scan may be needed.
Dacryocystography and dacryoscintigraphy are useful to detect anatomical abnormalities.
Subtraction DCG with a CT scan is also useful in understanding anatomical features of the lacrimal sac and surrounding structures.
The fluorescein dye disappearance test is useful in the clinic especially in those who cannot be syringed in the clinic. Prolonged retention of the dye usually more than 5 minutes indicates delayed drainage. The Jones test is useful to differentiate a functional block from an anatomical block.
Nasal endoscopy is useful to rule out hypertrophy of the inferior turbinate, septal deviation and inferior meatal narrowing

*Differential diagnosis:👇

Acute ethmoid sinusitis
Infected sebaceous cysts
Cellulitis
Eyelid ectropion
Punctual ectropion
Allergic rhinitis
Lacrimal sac or sinonasal tumor
Management
Management of acute dacryocystitis
Application of heat
Systemic antibiotics
Percutaneous abscess drainage
DCR (dacryocystorhinostomy) few weeks after acute infection resolves.

Monday, October 15, 2018

Nightfall Treatment In Homeopathy – स्वप्नदोष


Nightfall Treatment In Homeopathy – स्वप्नदोष

रात या दिन में सोते समय जब किसी व्यक्ति को कोई कामुक स्वप्न दिखकर या विना स्वप्न दिखे ही अनजाने में वीर्य स्खलित हो जाता है तो जल्दी-जल्दी उत्पन्न होती है तो यह शरीर को कमजोर कर देती है अतः इस स्थिति पर नियन्त्रण पाना जरूरी है ।
एसिड फॉस 12, 30- सभी प्रकार के अनैच्छिक वीर्यपात (जिसमें स्वप्नदोष भी शामिल है) में अत्यन्त लाभकर है । जननेन्द्रिय शिथिल पड़ गई हो, रोगी हस्तमैथुन का आदी हो या आदी रह चुका हो, शारीरिक और मानसिक दुर्बलता आने लगी हो- इन सभी लक्षणों में लाभप्रद है ।
डिजिटेलिस 3x- एसिड फॉस से लाभ न होने पर इस दवा की प्रतिदिन केवल एक मात्रा प्रात:काल नाश्ते के बाद लेनी चाहिये ।
थूजा Q- इस दवा की प्रतिदिन केवल पाँच बूंदें ही जल में मिलाकर देने से लाभ होता देखा गया है ।
स्टैफिसेग्रिया 6, 30- अश्लील स्वप्न दिखने के साथ ही वीर्यपात हो तो इस दवा का प्रयोग करना चाहिये ।
फॉस्फोरस 30- स्वप्नदोष होता हो जिससे स्नायविक दुर्बलता आ गई हो, अत्यधिक उत्तेजना रहती हो जिस कारण हस्तमैथुन करना पड़ जाये तो इस दवा के सेवन से लाभ होता है ।
कोनियम 30- स्वप्नदोष हो जिसके कारण पीठ में दर्द भी रहता हो, कामेच्छा होने पर भी जननेन्द्रिय उत्तेजित न हो तो इन लक्षणों में यह दवा लाभ करती है ।
बैराइटा कार्ब 30- स्वप्नदोष की उत्तम दवा है । साधारण प्रकार के स्वप्नदोष में प्रयोग करनी चाहिये ।
ऑरम मेट 12, 30- स्वप्नदोष होने के कारण रोगी सदैव उदास रहे, पदार्थ निकलता हो तो इन लक्षणों में देनी चाहिये ।
चायना 30- स्वप्नदोष के कारण आलस्य, भूख न लगना, जननेन्द्रिय का बार-बार उत्तेजित होना, कमजोरी- इन लक्षणों में दें ।

Sunday, October 14, 2018

What is feedback mechanism of hormones and how it works?

The feedback mechanism of hormones is the mechanism through which the balance of hormone in the blood/body is maintained. The increase or decrease in the concentration of that hormone can either stimulate the secretion of that particular hormone or inhibit the hormone secretion. This is called feedback.
There can be two type of feedback. One is called Positive feedback, and other is called negative feedback. The positive feedback stimulates the secretion or production of the hormone. On the counterpart, the negative feedback inhibits the secretion of the hormone.


For Example,
When we eat carbohydrate rich food, the glucose level in the blood increase. As the Blood Glucose level rise, the pancreas will secrete Insulin. This Insulin will signal the cells to take up the blood glucose. Hence The glucose level decrease in the blood. Now, if the insulin is still present in the blood, then more and more glucose will be transported inside the cell, and there would be a scarcity of the glucose in the blood. Hence to prevent this, negative feedback is generated due to low glucose level which would inhibit the insulin secretion in the blood.

Saturday, October 13, 2018

DATA COLLECTION

Data collection

Definition - What does Data Collection mean?

Data collection is the process of gathering and measuring data, information or any variables of interest in a standardized and established manner that enables the collector to answer or test hypothesis and evaluate outcomes of the particular collection. This is an integral, usually initial, component of any research done in any field of study such as the physical and social sciences, business, humanities and others.


explains Data Collection


Data collection is concerned with the accurate acquisition of data; although methods may differ depending on the field, the emphasis on ensuring accuracy remains the same. The primary goal of any data collection endeavor is to capture quality data or evidence that easily translates to rich data analysis that may lead to credible and conclusive answers to questions that have been posed.
Accurate data collection is essential to ensure the integrity of the research, regardless of the field of study or data preference (quantitative or qualitative). The selection of appropriate data collection tools and instruments, which may be existing, modified or totally new, and with clearly defined instructions for their proper use, reduces the chances of errors occurring during collection.
Distorted findings are often the result of improper data collection such as misleading questions on questionnaires, unknowingly omitting the collection of some supporting data, and other unintentional errors. This would lead to a skewed conclusion that may be useless.

Friday, October 12, 2018

The prevalence of homeopathy in the world


The practice of homeopathy varies greatly from one area of the globe to another, depending on each country’s heritage. Historically, homeopathy developed mostly in Europe (England, France, Switzerland, Germany, Belgium) and North America (United States and Canada). In these countries, homeopathy is taught in universities (with some schools entirely devoted to the field) and used even in hospitals. It should be noted that the use of homeopathy is more common with an educated public that is health conscious and open to natural practices, more generally found in developed countries with a higher rate of education.
Nevertheless, a significant evolution towards the practice of homeopathy can currently be observed in three countries with rapidly emerging economies: India, Brazil and Mexico. The structure of the health care system in these countries increasingly allows for both homeopathy and natural medicine, particularly in India, where homeopathy is becoming a major practice:
Gandhi greatly contributed to the development of homeopathy in India, where there are currently over 300’000 homeopathic practitioners.
Brazilians are very familiar with homeopathy, which has become a medical speciality there and is often prescribed by doctors. More and more people rely solely on homeopathy for their health.
The expansion of the practice of homeopathy seems inevitable, especially when it is integrated with allopathic medicine rather than being pursued dogmatically as a rival alternative to conventional treatment.
Following this evolution, we can expect homeopathy to have spread to the entire world within the next 10 years